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आनन्द की यात्रा

Anand kee yatra

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अहोभाव आराधना

 

मेरे सद्गुरु! पुणे के गुळवणी महाराज! आप तो गुळ (गुड़) से भी मीठे हो। नाम लेते-लेते आपकी मिठास में कई गुना श्रीवृद्धि होती जा रही है। भौतिक देह का विसर्जन कर आप चैतन्य रूप में अविरत, अखण्ड मेरे साथ हो गए हैं। मेरे अंतस में आसन जमाए आप साक्षात शिव हैं। आप तो मेरे नाथ हैं। आपका एकल नाम लेने का दोष मैं क्यों लूँ? इसलिए पुणे वाले पूज्यवर, मन के महादेव, मुक्तिदाता महाराज और सौभाग्य सूर्य के उदयकर्ता गुरुदेव कहती हूँ। आप तो सद्गुरुदेव हैं, सद्गुरु तो अनन्वय है अत: उसे सद्गुरु ही कहा जा सकता है।

सद्गुरु! मुझे तो आपकी चरणरज बनने का सौभाग्य मिल जाए यही पर्याप्त है । यह जीवन आपका दिया हुआ प्रसाद है, इसकी श्वासोच्छवास पर आपका अधिकार है, हर धड़कन आपके शुभनाम का गुंजन है। आपने कदम-कदम पर मुझे संभाला और सहेजा है। जीवन के हर संकट में आपके नाम की ढाल से आश्रय पाया है। सहज प्रेम और करुणा से आपने मेरा पथ कुसुममय कर दिया है। मेरी समस्त पूंजी का साकार स्वरूप हैं आप। आपने मुझ अकिंचन को जो दिया है वह जन्मजन्मांतर तक अखूट बना रहेगा। न तो मैं आपसे उऋण हो सकूंगी और न ही ऐसा चाहती भी हूँ । श्रीगुरुपौर्णिमा पर आपसे फ़िर आशीष चाहूँगी कि मेरे साधक, मेरे आश्रमवासी, मेरे स्वकीय, मेरे सद्गुरु मार्ग के संकेतों को जानें और मुझे आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने का संतोष मिले।             ………….आपकी ही ’बा’

पूर्वप्रसिद्धी जुलै 07 (गुरुपौर्णिमा)

 
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Posted by on जुलाई 3, 2012 in नवीन

 

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