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Tag Archives: raosaheb

सद्गुरु का अवतरण

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जब साधक किसी अनहोनी से गुजरता है,
निराशा के बादलों की ओट से संत्रास का अंधेरा उतरता है।
सभी आशाएं ध्वस्त हो जाती हैं, आशंकाएं खूब डराती है।
तब बेबस होकर वह डाल देता है हथियार, हो जाता है लाचार।
तभी यकायक एक प्रकाश कौंधता है और
समस्याओं का होने लगता क्षरण है, यही तो सद्गुरु का अवतरण है।

जिन्दगी कई ऐसे अवसर दिखाती है, जब बुद्धि निर्णय नहीं ले पाती हैं।
साधक ऊहापोह के दलदल में धंसते हुए अपने हाथ-पैर मारता है,
अपने आप पर अपनी खीझ उतारता है।
तभी यकायक महसूस होता है एक सहारा
सद्मार्ग की ओर बढ़ने लगते चरण है, यही तो सद्गुरु का अवतरण है।

साधक सजगता से साधन में लग जाता है,
किन्तु कई बार पूरे प्रयास के बाद भी एक कदम तक नहीं चल पाता है।
चित्त व्याकुल होकर इधर-उधर भगता है।
तभी यकायक एक नीलबिन्दु जगमगाता है
और स्वयमेव होने लगता पुनश्चरण है, यही तो सद्गुरु का अवतरण है।

यानी जब-जब संकट आते हैं,
संकटमोचक गुरु प्रकट हो जाते हैं।
पर मेरे प्रभु बा तो इससे लाख गुणा आगे हैं,
जो इनकी गहराई नहीं जान पाए
वे इस युग में सचमुच अभागे हैं।
ये शरीर, मन या साधन के लिए ही नहीं,
हर मोड़ पर साधक के साथ होते हैं,
प्रेम की अखण्ड धार से उसे पूरा भिगोते हैं।
साधक की शक्ति जगाकर करते हैं ऐसे ऐसे चमत्कार
कि करते हुए तो साधक दिखता है
पर सचमुच में करते हैं सद्गुरु सरकार।

तभी यकायक ध्यान आता है,
ऐसे तो यहां हर साधक के अनुभूत अनगिन उदाहरण है,
विश्वास करके देखें, हर क्षण,
हरेक के लिए उपलब्ध रहता
मेरे सद्गुरु का करुणामय अवतरण है।

(संकल्प दिवस पर व. राव द्वारा समर्पित)

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Posted by on फ़रवरी 28, 2014 in नवीन

 

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श्री गुरुपूर्णिमा- २०१२

Gurupaurnima 2012

 
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Posted by on जुलाई 21, 2013 in नवीन

 

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सद्गुरु शिव

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शिव जब आँखें खोलते हैं,

तो वे साधकों के मन को टटोलते हैं,

वे नाप लेते हैं

उनके साधन की गहराई

कर लेते हैं आकलन कि

किसके अंतस में

ध्यान की कितनी फ़सल है लहराई।

 

शिव जब आँखें बंद करते हैं

तो एक एक साधक को अपने दिल में

क्षमतानुसार उचित आसन पर

बिठाते जाते हैं।

फ़िर सभी को

अपने स्नेहरूपी धागे से जोड़कर

वासुदेव कुटुम्ब की

प्यारी सी माला बनाते हैं।

 

शिव जब मुस्कुराते हैं

तो वे कहते हैं–शाबाश, बढ़ते रहो, कहीं रुक नहीं जाना हैं।

 

शिव जब हाथ उठाते हैं

तो हमें संकेत करते हैं

कि तुम्हें बस यहीं तक तो आना हैं।

 

शिव जब आशीर्वाद मुद्रा में होते हैं

तो सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड की शक्ति हममें उण्डेल जाते हैं।

किस्मत हमारी है कि हम कितना ग्रहण कर पाते हैं।

 

शिव की ये सारी ही मुद्राएं, हमारे कल्याण के आयोजन हैं।

इनके सुझाए जप, ध्यान और सत्संग, हमारी आत्मा के भोजन हैं।

जो साधक की आत्मा के उन्नयन हेतु लीलाएं रचाता है।

वही सद्गुरु है, वही तो शिव कहाता है।

ऐसे सद्गुरु शिव की स्तुति ही

सहज संवेदना व स्फ़ुरणा प्रकटाती है।

सांसों में स्पंदन और संकल्पों में सबलता लाती हैं।

 

मेरे सद्गुरु मेरे शिव, तुम हम पर इतना अनुग्रह बरसाना।

हर शिवरात्रि को अपनी समस्त मुद्राओं का दर्शन कराना।

उन मुद्राओं के प्रभाव से हम यों शिवमय हो जाएं।

जिस सद्गुरु शिव ने प्रकटाया है,

अंतत: हम उसकी सत्ता में ही समा जाएं।

महाशिवरात्री पर रावसाहेबद्वारा विरचित आस्थाकाव्य

 
1 टिप्पणी

Posted by on जून 5, 2013 in नवीन

 

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